मॉडर्न जस्टिस सिस्टम में मध्यस्थता क्यों ज़रूरी — जज नागरत्ना

मॉडर्न जस्टिस सिस्टम में मध्यस्थता क्यों ज़रूरी — जज नागरत्ना

नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था में बदलाव की बयार के बीच Supreme Court की वरिष्ठ जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को एक अहम statement दिया। उन्होंने कहा कि आज के मॉडर्न जस्टिस सिस्टम में मध्यस्थता (Mediation) और सुलह-समझौते (Conciliation) की भूमिका बेहद अहम हो गई है। जस्टिस नागरत्ना ने यह बात 11 अप्रैल 2026 को एक legal conference में कही, जहाँ देशभर से judges, lawyers और policy experts मौजूद थे। उनका मानना है कि अदालतों पर बढ़ते case के बोझ को कम करने का सबसे कारगर तरीका यही है कि विवादों को court के बाहर, आपसी सहमति से सुलझाया जाए। यह सिर्फ एक कानूनी ज़रूरत नहीं, बल्कि समाज की माँग भी है।

मध्यस्थता अधिनियम 2023 — एक अहम कदम, लेकिन काम अधूरा

जस्टिस नागरत्ना ने अपने संबोधन में Mediation Act, 2023 का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह कानून भारत में मध्यस्थता को एक संस्थागत रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस act के तहत पहली बार mediation को एक structured और legally recognized process के रूप में define किया गया है। लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने यह भी साफ तौर पर स्वीकार किया कि इस कानून का implementation अभी भी बेहद सीमित है। ज़मीनी हकीकत यह है कि देश के बड़े शहरों में तो mediation centers काम कर रहे हैं, लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में यह system अभी तक ठीक से नहीं पहुँच पाया है। उन्होंने कहा कि सिर्फ कानून बना देने से काम नहीं चलेगा — इसे ground level पर लागू करना होगा।

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी बताया कि Mediation Act, 2023 के तहत pre-litigation mediation का प्रावधान है, यानी court में case दर्ज करने से पहले भी दोनों पक्ष mediation का रास्ता अपना सकते हैं। यह एक बड़ा बदलाव है। अगर यह system सही तरीके से काम करे, तो लाखों cases court तक पहुँचने से पहले ही सुलझ सकते हैं। इससे न सिर्फ judges पर बोझ कम होगा, बल्कि आम नागरिक को भी सालों की लंबी legal लड़ाई से राहत मिलेगी।

भारत में pending cases का संकट — आँकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं

भारत में courts पर pending cases का बोझ किसी से छुपा नहीं है। National Judicial Data Grid के मुताबिक, देशभर की district courts में 4 करोड़ से अधिक cases pending हैं। High Courts में यह संख्या 60 लाख के पार है। Supreme Court में भी हज़ारों cases सालों से लंबित हैं। इस भारी backlog की वजह से एक आम नागरिक को न्याय मिलने में 10 से 15 साल तक का इंतज़ार करना पड़ता है। यह situation न सिर्फ न्याय व्यवस्था के लिए, बल्कि देश की economic growth के लिए भी नुकसानदेह है। जब business disputes सालों तक courts में अटके रहते हैं, तो investors का भरोसा कमज़ोर होता है।

जस्टिस नागरत्ना ने इसी संदर्भ में mediation को एक practical solution के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि जिन देशों ने mediation को seriously लिया है — जैसे Singapore, USA और UK — वहाँ court cases की संख्या में काफी कमी आई है। Singapore तो आज दुनिया का एक leading mediation hub बन चुका है। भारत के पास भी यह potential है, लेकिन इसके लिए awareness और infrastructure दोनों की ज़रूरत है।

जस्टिस नागरत्ना का direct quote — सुलह सिर्फ समझौता नहीं, यह न्याय का एक रूप है

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने conference में कहा, “Mediation और conciliation को कमज़ोर का रास्ता मत समझिए। यह न्याय का एक equally valid और powerful रूप है। जब दो पक्ष आपसी सहमति से किसी नतीजे पर पहुँचते हैं, तो वह settlement किसी court order से ज़्यादा टिकाऊ होती है — क्योंकि उसमें दोनों की मर्ज़ी शामिल होती है।” उनका यह statement legal community में काफी चर्चा का विषय बन गया। कई senior advocates ने इस बात से सहमति जताई कि mediation को अभी भी भारत में वह सम्मान नहीं मिला जिसका वह हकदार है। लोगों में अभी भी यह धारणा है कि court जाना ही असली न्याय है — इस सोच को बदलना होगा।

Mediation को लेकर challenges — awareness और training की कमी

जस्टिस नागरत्ना ने mediation के रास्ते में आने वाली कुछ बड़ी challenges का भी ज़िक्र किया। पहली और सबसे बड़ी समस्या है — trained mediators की कमी। देश में अभी qualified mediators की संख्या बेहद कम है। Mediation Act, 2023 में Mediation Council of India के गठन का प्रावधान है, जो mediators को certify और regulate करेगी। लेकिन यह council अभी तक पूरी तरह operational नहीं हुई है। दूसरी बड़ी चुनौती है public awareness की कमी। ज़्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं कि mediation एक option है। वकील भी अक्सर clients को directly court जाने की सलाह देते हैं, क्योंकि उनके लिए यही financially फायदेमंद होता है।

इसके अलावा, corporate sector में भी mediation को लेकर hesitation है। बड़ी companies अक्सर arbitration को prefer करती हैं, mediation को नहीं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इन सभी barriers को तोड़ने के लिए law schools में mediation की training अनिवार्य करनी होगी और bar councils को भी इस दिशा में active role निभाना होगा।

आगे क्या — सवाल यह है कि implementation कब होगा?

जस्टिस नागरत्ना के इस statement के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि Mediation Act, 2023 को ground level पर लागू करने की timeline क्या होगी। Mediation Council of India कब तक पूरी तरह काम शुरू करेगी? क्या government इस दिशा में कोई concrete action plan लेकर आएगी? Legal experts का मानना है कि अगर अगले 2-3 साल में infrastructure तैयार नहीं हुआ, तो यह कानून भी बाकी कानूनों की तरह सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाएगा। आम नागरिक के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि अगर mediation system सही तरीके से काम करे, तो उन्हें सालों की court लड़ाई से मुक्ति मिल सकती है — और न्याय तेज़, सस्ता और कम तनावपूर्ण हो सकता है।

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