मॉडर्न जस्टिस में मध्यस्थता क्यों ज़रूरी है — जज नागरत्ना

मॉडर्न जस्टिस में मध्यस्थता क्यों ज़रूरी है — जज नागरत्ना

नई दिल्ली। शनिवार को एक कानूनी सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने साफ शब्दों में कहा कि आज के दौर में अदालतों पर बढ़ते बोझ को देखते हुए मध्यस्थता (Mediation) और सुलह-समझौते (Conciliation) जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तरीके बेहद ज़रूरी हो गए हैं। उन्होंने कहा कि जब दो पक्ष आपसी सहमति से किसी तीसरे की मदद से अपना विवाद सुलझा लेते हैं, तो यह न सिर्फ समय बचाता है, बल्कि रिश्तों को भी बचाता है। जस्टिस नागरत्ना ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून भारत में मध्यस्थता को एक संस्थागत रूप देने की दिशा में अहम कदम है — लेकिन इसका ज़मीनी स्तर पर अमल अभी भी सीमित है। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब देशभर की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित पड़े हैं और न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं।

मध्यस्थता अधिनियम 2023 — एक नई शुरुआत, लेकिन अधूरी

भारत सरकार ने 2023 में मध्यस्थता अधिनियम पारित किया था, जिसका मकसद था कि विवादों को अदालत के बाहर, एक trained mediator की मदद से सुलझाया जाए। इस कानून के तहत पहले मध्यस्थता की कोशिश करना ज़रूरी बनाया गया — खासकर नागरिक और व्यावसायिक मामलों में। जस्टिस नागरत्ना ने इस कानून की तारीफ करते हुए कहा, “मध्यस्थता अधिनियम 2023 एक सोची-समझी पहल है, लेकिन जब तक इसे ज़मीन पर उतारने के लिए trained professionals, awareness और infrastructure नहीं होगा, तब तक यह सिर्फ कागज़ पर ही रहेगा।” उनकी यह बात सीधे उस खाई को उजागर करती है जो नीति और अमल के बीच अक्सर देखी जाती है। देश में certified mediators की संख्या अभी भी बेहद कम है, और आम नागरिक को यह भी नहीं पता कि मध्यस्थता का विकल्प उनके लिए उपलब्ध है।

इस कानून के तहत एक National Mediation Council बनाने का प्रावधान भी है, जो mediators को certify करेगी और standards तय करेगी। लेकिन अप्रैल 2026 तक यह council पूरी तरह functional नहीं हो पाई है। कानूनी जानकारों का मानना है कि जब तक यह ढांचा मज़बूत नहीं होगा, तब तक मध्यस्थता को mainstream नहीं बनाया जा सकता।

अदालतों पर बोझ — आँकड़े जो सोचने पर मजबूर करें

भारत में इस वक्त सुप्रीम कोर्ट से लेकर ज़िला अदालतों तक करीब 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है जो पारिवारिक विवाद, संपत्ति के झगड़े, या छोटे व्यावसायिक मतभेद हैं — यानी वो मामले जो मध्यस्थता से आसानी से सुलझ सकते थे। जस्टिस नागरत्ना ने इस पर कहा कि अगर इन मामलों का 30 से 40 प्रतिशत भी मध्यस्थता के ज़रिए निपट जाए, तो अदालतों को बड़ी राहत मिलेगी और जो गंभीर आपराधिक या संवैधानिक मामले हैं, उन पर ज़्यादा ध्यान दिया जा सकेगा। सवाल यह है कि इस बदलाव के लिए ज़िम्मेदारी किसकी है — सरकार की, वकीलों की, या खुद नागरिकों की?

दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में कुछ Mediation Centers काम कर रहे हैं, लेकिन छोटे शहरों और गाँवों में यह सुविधा नाममात्र की है। ज़मीनी हकीकत यह है कि जिन लोगों को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उन तक यह सुविधा पहुँच ही नहीं पाई है।

मध्यस्थता बनाम अदालत — फर्क क्या है और फायदा किसे?

मध्यस्थता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दोनों पक्ष एक neutral तीसरे व्यक्ति — यानी mediator — की मदद से अपना विवाद सुलझाते हैं। यह अदालती प्रक्रिया से अलग है क्योंकि यहाँ कोई जज फैसला नहीं सुनाता — दोनों पक्ष खुद अपनी शर्तों पर समझौता करते हैं। इसमें समय कम लगता है, खर्च कम होता है, और सबसे बड़ी बात — गोपनीयता बनी रहती है। व्यावसायिक विवादों में यह खासतौर पर फायदेमंद है क्योंकि कोई भी कंपनी नहीं चाहती कि उसके आंतरिक मामले अदालत में सार्वजनिक हों। पारिवारिक मामलों में भी मध्यस्थता रिश्तों को बचाने का काम करती है — जो अदालती लड़ाई में अक्सर टूट जाते हैं।

एक वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ के अनुसार, “मध्यस्थता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दोनों पक्ष जीतते हैं — यह win-win solution है। अदालत में एक जीतता है और एक हारता है, लेकिन मध्यस्थता में दोनों की बात सुनी जाती है और दोनों की ज़रूरतें ध्यान में रखी जाती हैं।” यही वजह है कि दुनिया के कई विकसित देशों में मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया है।

आगे की राह — क्या बदलना होगा?

जस्टिस नागरत्ना ने अपने संबोधन में कुछ ठोस सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि law schools में मध्यस्थता की पढ़ाई को अनिवार्य किया जाए, ताकि नई पीढ़ी के वकील इस प्रक्रिया को समझें और अपने clients को इसके बारे में बताएं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी विभागों को भी मध्यस्थता अपनानी चाहिए — क्योंकि सरकार खुद देश में सबसे बड़ी litigant है। अगर सरकारी मामलों में भी मध्यस्थता का रास्ता अपनाया जाए, तो अदालतों पर बोझ काफी कम हो सकता है। जो बात सबसे अहम है वो यह है कि मध्यस्थता को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ानी होगी — स्कूल, कॉलेज, पंचायत, हर स्तर पर।

अब देखना यह है कि सरकार जस्टिस नागरत्ना जैसे वरिष्ठ न्यायाधीशों की इन बातों को कितनी गंभीरता से लेती है। मध्यस्थता अधिनियम 2023 का ढाँचा तो बन गया है — लेकिन उसमें जान फूँकने का काम अभी बाकी है। क्या भारत 2030 तक एक ऐसी न्याय व्यवस्था बना पाएगा जहाँ हर नागरिक को समय पर और सस्ता न्याय मिले? यह सवाल आज भी खुला है।

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