इस्लामाबाद में US-ईरान वार्ता: पहले दिन क्या हुआ?

इस्लामाबाद में US-ईरान वार्ता: पहले दिन क्या हुआ?

इस्लामाबाद। शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का पहला दौर संपन्न हुआ। सीजफायर के बाद शुरू हुई इस बातचीत में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल मेज पर तो आए, लेकिन अपनी-अपनी शर्तों से एक इंच भी पीछे नहीं हटे। कूटनीतिक हलकों में इस वार्ता को पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए ‘मेक या ब्रेक’ का क्षण माना जा रहा है — यानी या तो शांति बनेगी, या तबाही तय है।

पहले दिन क्या हुआ — मेज पर क्या रखा गया?

वार्ता की शुरुआत सुबह 10 बजे पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के सम्मेलन कक्ष में हुई। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व एक वरिष्ठ राजनयिक अधिकारी ने किया, जबकि ईरान की ओर से परमाणु और विदेश नीति के विशेषज्ञ शामिल थे। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि यह वार्ता “क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।” बातचीत के पहले सत्र में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं। सूत्रों के अनुसार, माहौल शुरू से ही तनावपूर्ण था — न हाथ मिलाने की गर्मजोशी, न किसी समझौते की झलक। दोपहर के सत्र में तकनीकी स्तर की बातचीत हुई, जिसमें परमाणु निरीक्षण, प्रतिबंधों की समीक्षा और जब्त संपत्तियों के मुद्दे उठाए गए। शाम तक कोई संयुक्त बयान नहीं आया — यही इस दिन का सबसे बड़ा संदेश था।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी है। बातचीत जारी है और हम उम्मीद करते हैं कि कल के सत्र में कुछ सकारात्मक निकलेगा।” यह बयान सावधानी से चुने गए शब्दों का उदाहरण था — न उत्साह, न निराशा।

ईरान की शर्तें — परमाणु कार्यक्रम और जब्त संपत्तियां

ईरान ने वार्ता में दो मुख्य मांगें रखी हैं। पहली — उसके परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले और उस पर लगाई गई सभी पाबंदियां हटाई जाएं। दूसरी — अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा जब्त की गई ईरानी संपत्तियां वापस की जाएं, जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर में बताई जाती है। तेहरान का तर्क है कि बिना इन दोनों शर्तों के कोई भी समझौता “अधूरा और अस्वीकार्य” होगा। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे जो उनकी संप्रभुता को सीमित करे। जानकारों का मानना है कि ईरान इस वार्ता में कमज़ोर स्थिति से नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के साथ आया है — वह जानता है कि अमेरिका भी इस क्षेत्र में एक और संघर्ष नहीं चाहता।

अमेरिका का रुख — झुकने को तैयार नहीं

अमेरिकी पक्ष ने पहले दिन साफ कर दिया कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर किसी भी तरह की “बिना शर्त छूट” देने के मूड में नहीं है। वाशिंगटन की मांग है कि ईरान पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को पूर्ण निरीक्षण की अनुमति दे, उसके बाद ही प्रतिबंध हटाने पर विचार होगा। अमेरिकी प्रतिनिधि ने बैठक के बाद पत्रकारों से कहा, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन शांति की कीमत पर सुरक्षा से समझौता नहीं होगा।” यह बयान वाशिंगटन की उस पुरानी नीति का विस्तार है जो कहती है — पहले पारदर्शिता, फिर राहत। अमेरिका के सहयोगी देशों, खासकर इज़राइल और खाड़ी देशों की नज़रें भी इस वार्ता पर टिकी हैं। वे नहीं चाहते कि ईरान को बिना ठोस गारंटी के कोई रियायत मिले।

पाकिस्तान की मध्यस्थता — कितनी कारगर?

इस पूरी वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका सबसे दिलचस्प है। इस्लामाबाद ने खुद को एक “तटस्थ और भरोसेमंद मध्यस्थ” के रूप में पेश किया है। पाकिस्तान के लिए यह कूटनीतिक अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। एक तरफ वह अमेरिका का पुराना सहयोगी रहा है, दूसरी तरफ ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा और धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध हैं। इस्लामाबाद के कूटनीतिक विशेषज्ञ डॉ. फैसल अहमद का कहना है, “पाकिस्तान के लिए यह वार्ता सफल करवाना सिर्फ क्षेत्रीय शांति का सवाल नहीं, बल्कि अपनी अंतरराष्ट्रीय साख बचाने का भी मौका है।” हालांकि, आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान की अपनी आंतरिक कमज़ोरियां उसे एक प्रभावशाली मध्यस्थ बनने से रोक सकती हैं।

अगर वार्ता विफल हुई तो क्या होगा?

विश्लेषकों की चिंता यह है कि अगर यह वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हुई, तो पश्चिम एशिया में हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। सीजफायर अभी नाज़ुक है — दोनों तरफ से सैन्य तैयारियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। तेल की कीमतें पहले से ही अस्थिर हैं और वार्ता के विफल होने की खबर से वैश्विक बाज़ारों पर तत्काल असर पड़ सकता है। भारत जैसे देश, जो इस क्षेत्र से ऊर्जा आयात करते हैं, इस वार्ता के नतीजे पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं। नई दिल्ली ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत “शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता है।”

वार्ता का दूसरा दौर रविवार, 12 अप्रैल को होगा। सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष रात भर में अपनी-अपनी कठोर शर्तों में कोई लचीलापन ला पाएंगे — या फिर यह मेज़ सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी? दुनिया की नज़रें इस्लामाबाद पर टिकी हैं।

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